Tuesday, May 19, 2015

यूपी में आईपीएस के स्वीकृत पदों में से 25 प्रतिशत से भी अधिक पद खाली

http://tarunmitra.in/news.php?id=6276&title=In%20Uttar%20Pradesh,%20more%20than%2025%20percent%20of%20IPS%20posts%20vacant

लखनऊ। आबादी के हिसाब से देश के सर्वाधिक बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में अखिल भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के स्वीकृत पदों में से 25 प्रतिशत से भी अधिक पद खाली हैं। यह हाल तो तब है जब इस देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह समेत लगभग 73 सांसद इसी सूबे से चुनाव जीतकर संसद में पंहुचे हैं। 

ऐसे में नियत से कम अधिकारी कार्यरत होने से कुछ अधिकारियों को एक से अधिक पदों के दायित्व देने पड़ रहे हैं। जाहिर है कानून व्यवस्था जैसे अहम मुद्दे पर ऐसा करना न सिर्फ पुलिस अधिकारियों के लिए असहज हो रहा है, बल्कि इसका सीधा दुष्प्रभाव आम जनता पर पड़ रहा है। 

ये हाल तब है, जब केन्द्र और प्रदेश सरकार दोनों कानून व्यवस्था को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल करने का दावा करती हैं।  

यूपी में पुलिस महानिदेशक कार्यालय द्वारा दी गयी सूचना के अनुसार यूपीआईपीएस केडर के स्वीकृत पदों की कुल संख्या 517 है, जिसमें से महज 386 पद ही भरे हैं और 131 पद खाली हैं। 

जनसूचना अधिकारी तनूजा चंद्रा द्वारा दी गयी सूचना के अनुसार 52 पदों पर अनुसूचित जाति के, 15 पर अनुसूचित जनजाति के, 73 पर अन्य पिछड़ा वर्ग के और 246 पर अनारक्षित श्रेणी के अधिकारी कार्यरत हैं। कुल कार्यरत अधिकारियों में से 365 पदों पर हिंदू अधिकारी हैं और महज 10 पदों पर ही गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक कार्यरत हैं और महज 11 पदों पर मुस्लिम अधिकारी कार्यरत हैं।  

इस जानकारी को हासिल करने वाली आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा कहती हैं कि आरक्षित वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकारियों का कम प्रतिनिधित्व समाज के वंचित वर्ग को मुख्यधारा में  लाने को चलायी गयी  योजनाओं और केंद्र सरकार और उस की उन घोषणाओं की सफलता पर एक प्रश्नचिन्ह है क्योंकि आज़ादी के इतने दिनों बाद भी आरक्षित वर्ग मुस्लिम समुदाय को मुख्य धारा में लाने की इतनी योजनायें होने के बावजूद अपनी आवादी के अनुपात में इन सेवाओं में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व नगण्य है। 

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